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रसायन चूर्ण

(औषध एवं टॉनिक)

रसायनं तु यत् प्रोक्तं आधिव्याधि विनाशनम्।

जो द्रव्य यो औषधि वृद्धावस्था एवं समस्त रोगों का नाश करती है, वह है रसायन। शरीर में रस आदि सप्तधातुओं का अयन अर्थात् उत्पत्ति करने में जो सहायक होती है उस औषधि को रसायन कहा जाता है।


इस चूर्ण में गुडुच (गिलोय), गोखरू एवं आँवले होते हैं, जिनके गुणधर्म निम्नानुसार हैं-


गुडुच (गिलोय)- अमृत जैसे गुण रखने के कारण यह औषधि अमृता कहलाती है। त्रिदोषशामक होने से प्रत्येक रोग में, तीनों प्रकार की प्रकृति में, प्रत्येक ऋतु में ली जा सकती है। गुणों में उष्ण होने पर भी विपाक में मधुर होने से समशीतोष्ण गुणवाली है। इसमें स्निग्धता होने से बलप्रद एवं शुद्धवर्धक है।


गोखरूः यह औषधि ठंडी होने से गुडुच की उष्णता का निवारण करने वाली है एवं पेशाब साफ लाकर मूत्रवहन तंत्र के समस्त रोगों को मिटाती है। यह शुक्रवर्धक एवं बलप्रद है।


आँवलाः यह औषधि ठंडी, त्रिदोषनाशक, रसायन, वयःस्थापक (यौवन स्थिर रखने वाली या यौवनरक्षक), हृदय एवं नेत्रों के लिए हितकर, रक्तवर्धक, मलशुद्धि करने वाली, धातुवर्धक एवं ज्ञानेन्द्रियों की शक्ति को बढ़ाने वाली है।


आयुर्वेद के अनुसार 40 वर्ष की उम्र से प्रत्येक व्यक्ति को नीरोग रहने हेतु हररोज रसायन चूर्ण का सेवन करना चाहिए क्योंकि यह चूर्ण बड़ी उम्र में होने वाली व्याधिओं का नाश करता है और शरीर में शक्ति स्फूर्ति एवं ताजगी तथा दीर्घजीवन देने वाला है।


प्रतिदिन इस चूर्ण का सेवन करने से व्यक्ति स्वस्थ एवं दीर्घायु होता है, उसकी आँखों का तेज बढ़ता है तथा पाचन ठीक होता है। जिस कारण भूख अच्छी लगती है।


यह चूर्ण तीनों दोषों को सम करने वाला है। अश्वगंधा चूर्ण के साथ लेने पर अत्यंत वीर्यवर्धक है। उदररोग, आँतों के दोष, स्वप्नदोष तथा पेशाब में वीर्य जाने के दोष को दूर करने वाला है। इस चूर्ण के सेवन से शरीर में शक्ति, स्फूर्ति एवं ताजगी का अनुभव होता है। पाचनतंत्र, नाड़ीतंत्र तथा ओज-वीर्य की रक्षा करता है तथा बुढ़ापे की कमजोरी एवं बीमारी से बचाता है। छोटे-बड़े, रोगी निरोगी सभी इसका सेवन कर सकते हैं। सुबह दातुन करके चूसते चूसते यह चूर्ण लें तो विशेष लाभ होगा। इसे पानी से लें अथवा दूध से भी ले सकते हैं।


पानी के साथ तो प्रत्येक व्यक्ति यह चूर्ण ले सकता है परंतु विशेष रोग में विशेष लाभ के लिए निम्नानुसार सेवन करें।


कफ के रोगों में शहद के साथ, वायु के रोगों में घी के साथ तथा पित्त के रोगों में मिश्री के साथ।


पीलिया के रोग में 1 ग्राम लेंडीपीपर के साथ।


मधुमेह में बड़ी मात्रा 6 से 10 ग्राम चूर्ण दिन मे दो से तीन बार पानी के साथ।


मूत्र की जलन में घी-मिश्री के साथ यह चूर्ण लें।


मूत्रावरोध में ककड़ी के साथ लें।


यौन दौर्बल्य में एवं सामान्य कमजोरी में दूध अथवा घी-मिश्री के साथ लें। प्रदररोग में चावल के माँड के साथ लें।


चेहरे पर आँखों के नीचे काले दाग हो गये हों तो 2 ग्राम मुलहठी के चूर्ण में मिलाकर सुबह-शाम दूध के साथ लें।


बाल काले करने के लिए 20 से 40 मि.ली. भाँगरे के रस में लें।


मात्राः इस चूर्ण की 2 से 10 ग्राम तक की मात्रा उम्र एवं शरीर के अनुसार ली जा सकती है।


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